कर्णी सिंह  

कर्णी सिंह
महाराजा कर्णी सिंह
पूरा नाम महाराजा कर्णी सिंह
जन्म 21 अप्रैल, 1924
जन्म भूमि बीकानेर, राजस्थान
मृत्यु 6 सितम्बर, 1988
मृत्यु स्थान नई दिल्ली
अभिभावक महाराजा सादूल सिंह
संतान राज्यश्री कुमारी
कर्म भूमि भारत
खेल-क्षेत्र निशानेबाज़ (शूटिंग)
शिक्षा पी.एच.डी.
विद्यालय मुम्बई विश्वविद्यालय
पुरस्कार-उपाधि अर्जुन पुरस्कार, 1961
प्रसिद्धि निशानेबाज़
विशेष योगदान इन्होंने अपनी निशानेबाज़ी की यादगार लम्हों को एक पुस्तक के रूप में भी प्रस्तुत किया, जिसका नाम है- ”फ़्रॉम रोम टू मास्को”
नागरिकता भारतीय
विशेष यह कलाकार, पायलट, फोटोग्राफर गोल्फर भी थे
अन्य जानकारी यह देश के ऐसे पहले शूटर थे, जिन्हें भारत में पहली बार ‘अर्जुन पुरस्कार’ देकर सम्मानित किया गया। यह पुरस्कार इन्हें 1961 में प्रदान किया गया।
अद्यतन‎ 04:10, 05 नवम्बर-2016 (IST)

महाराजा कर्णी सिंह (अंग्रेज़ी: Maharaja Karni Singh, 21 अप्रैल, 1924, बीकानेर; मृत्यु- 6 सितम्बर, 1988, नई दिल्ली) को प्रतियोगात्मक निशानेबाज़ी का जनक माना जा सकता है। मेजर जनरल हिज हाईनेस डॉक्टर कर्णी सिंह बीकानेर के महाराजा थे। उनके राजा होने के कारण उनका हर अंदाज राजसी था। उनके विविध प्रकार के शौक थे। राजा कर्णी सिंह की अनेकों उपलब्धियां थीं। उनका व्यक्तित्व व अंदाज भी बिल्कुल शाही था। वह पहले निशानेबाज़ थे, जिन्हें 1961 में ‘अर्जुन पुरस्कार’ देकर सम्मानित किया गया था।

परिचय

महाराजा कर्णी सिंह का जन्म 21 अप्रैल सन 1924 को बीकानेर, राजस्थान में हुआ था। वे निर्भीक राजपूत शासकों में 23वें शासक थे। उनके लिए हथियारों को पकड़ना या कुशलता के साथ चलाना एक सामान्य बात थी। उनके लिए कोई बंदूक या हथियार चलाना एक ऐसा स्वाभाविक कार्य था, जैसे किसी व्यक्ति के लिए चलना।[1]

शिक्षा

कर्णी सिंह ने निशानेबाज़ी की शुरुआत अपने पिता स्वर्गीय महाराजा सादूल सिंह की देखरेख में की। उन्होंने अपने पिता से बन्दूकों के बारे में हर प्रकार की जानकारी हासिल की। कर्णी सिंह की शिक्षा दिल्ली के सेंट स्टीफेंस कॉलेज में तथा मुम्बई के सेंट जेवियर्स कॉलेज से हुई। कर्णी सिंह ने मुम्बई विश्वविद्यालय से पी.एच.डी. की डिग्री भी हासिल की। उनकी थीसिस का विषय था- ”द रिलेशन हाउस ऑफ़ बीकानेर विद सेंट्रल पावर्स फ़्रॉम 1465 टू 1949”। कर्णी सिंह ने अपने निशानेबाज़ी के यादगार लम्हों को एक पुस्तक के रूप में भी प्रस्तुत किया, जिसका नाम है- ”फ़्रॉम रोम टू मास्को”।

बदूक का पहला अनुभव

कर्णी सिंह को बदूक का पहला अनुभव मात्र 13 वर्ष की आयु में हुआ, जब उन्होंने एक चिड़िया को अपने सही निशाने से मार गिराया। इस चिड़िया को मारने से उनकी निशानेबाज़ी की भीतरी चाहत को जहाँ बहुत संतुष्टि मिली, वहीं भावनात्मक रूप से वह बहुत आहत हुए। इसके पश्चात् उन्होंने निश्चय किया कि वह केवल शौक या आनंद के लिए निशानेबाज़ी करके किसी पक्षी या जानवर को नहीं मारेंगे। तब से उन्होंने अपना इरादा केवल निशानेबाज़ी का कर लिया।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 1.2 महाराजा कर्णी सिंह का जीवन परिचय (हिंदी) कैसे और क्या। अभिगमन तिथि: 04 सितम्बर, 2016।

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