कथकली नृत्य  

कथकली नृत्य, केरल

कथकली नृत्य केरल के दक्षिण-पश्चिमी राज्‍य का एक समृद्ध और फलने-फूलने वाला शास्त्रीय नृत्य तथा यहाँ की परम्‍परा है। 'कथकली' का अर्थ है- 'एक कथा का नाटक' या 'एक नृत्‍य नाटिका'। 'कथा' का अर्थ है- 'कहानी'। इस नृत्य में अभिनेता रामायण और महाभारत के महाग्रंथों और पुराणों से लिए गए चरित्रों का अभिनय करते हैं। यह अत्‍यंत रंग-बिरंगा नृत्‍य है। इसके नर्तक उभरे हुए परिधानों, फूलदार दुपट्टों, आभूषणों और मुकुट से सजे होते हैं। वे उन विभिन्‍न भूमिकाओं को चित्रित करने के लिए सांकेतिक रूप से विशिष्‍ट प्रकार का रूप धरते हैं, जो वैयक्तिक चरित्र के बजाए उस चरित्र के अधिक नज़दीक होते हैं।

कथा नृत्य

भारतीय नृत्य रूपों में अद्वितीय कथकली नृत्य केरल का शास्त्रीय नृत्य नाटक है। ज्वलंत और समृद्व विशेषताओं जैसे हाथों के साथ गाना, भाव में प्राकृतिक और प्रभावशाली, हलचल में सुंदर और तालबद्व, नृत्य में मनमोहक और सबसे ख़ास कल्पना के स्तर पर मनभावन के कारण भारतीय नृत्य कलाओं में कथकली को उच्च दर्जा प्राप्त है। विषयों के आधार पर कथकली प्राचीन पुराणों की कथाओं पर आधारित है। अगर इसकी पुरातन वेशभूषा, अजीबो-गरीब रूप सज्जा ओर भव्य आभूषणों को देखें तो हम पायेंगे कि कथकली भारत का एकमात्र ऐसा नृत्य है, जो अपनी मर्दाना पहलू की मौलिक ताकत पर संरक्षित है।[1]

इतिहास

कथकली के बारे मे यह माना जाता है कि यह 300 या 400 साल पुरानी कला नहीं हैं, इसकी वास्तविक उत्पत्ति 1500 साल पहले से है। कथकली विकास की एक लंबी प्रक्रिया से गुजरी है और इसकी इस यात्रा ने केरल में कई अन्य मिश्रित कलाओं के जन्म और विकास का मार्ग भी प्रशस्त किया है। कथकली को आर्यन और द्रविड सभ्यता के प्रतीक के रूप में भी देखा जा सकता है, जिसने अनुष्ठान और संस्कृतियों को समझते हुए उनके साथ मिलकर इन सभ्यताओं से नाटक और नृत्य की इस कला को उधार लिया। कथकली के इतिहास के पुनर्निर्माण में यह बात ध्यान रखना आवश्यक है कि व्यावहारिक रूप से सभी प्रकार के औपचारिक नृत्य, नाटक और नृत्य नाटक की सभी कलाओं को अस्तित्व में लाने का श्रेय कथकली को ही जाता है। एक अध्ययन के दौरान यह साबित भी हो चुका है कि केरल के सभी प्रारंभिक नृत्य और नाटक जैसे- 'चकइरकोथू' और 'कोडियाट्टम', कई धार्मिक नृत्य जो भगवती पंथ से संबंधित है जैसे- 'मुडियाअट्टू', 'थियाट्टम' और 'थेयाम', सामाजिक, धार्मिक और वैवाहित नृत्य जैसे- 'सस्त्राकली' और 'इजामट्क्कली' और बाद में विकसित नृत्य जैसे- 'कृष्णाअट्टम' और 'रामाअट्टम' आदि कथकली की ही देन हैं। कथकली कला में कई नृत्य और नाटकों की विशेषताओं को शामिल किया जा सकता है और यह वर्णन करने में भी आसान है कि कथकली इन रूपों के प्रारंभ में ही विकसित हो चुकी थी।
कथकली नृत्य, केरल

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 1.2 1.3 कला और संस्कृति (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 24 जुलाई, 2012।

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