इब्न सिना  

इब्न सिना इनका नाम अबूअल्‌ हुसेन इब्न सिना था, इब्रानी में अवेन सीना तथा लातीनी में अविचेन्ना था। इनका जन्म सन्‌ 370 हि. (सन्‌ 980 ई.) में बुखारा के पास अफ़्‌शन: में हुआ था और यह सन्‌ 428 हि (सन्‌ 1037 ई.) में हमदान में मरे। इनके माता-पिता ईरानी वंश के थे। इनके पिता खरमैत: के शासक थे। इब्न सिना ने बुखारा में शिक्षा प्राप्त की। आरंभ में कुरान तथा साहित्य का अध्ययन किया। शरअ की शिक्षा के अनंतर इन्होंने तर्क, गणित, रेखागणित तथा ज्योतिष में योग्यता प्राप्त की। शीघ्र ही इनकी बुद्धि इतनी परिपक्व तथा उन्नत हो गई कि इन्हें किसी गुरु की अपेक्षा नहीं रह गई और इन्होंने निजी स्वाघ्याय से भौतिक विज्ञान, पारभौतिक दर्शन तथा वैद्यक में योग्यता प्राप्त कर ली। हकीमी सीखते समय से ही इन्होंने उसका व्यवसाय भी आरंभ कर दिया जिससे उस विषय में पारंगत हो गए। दर्शनशास्त्र से इनका वास्तविक संबंध अल्‌फराबी की रचनाओं के अध्ययन से हुआ। अल्‌फराबी के पारभौतिक दर्शन तथा तर्कशास्त्र की नींव नवआफलातूनी व्याख्याओं तथा अरस्तू की रचनाओं के अरबी अनुवादों पर थी। इन्होंने इब्न सिना की कल्पनाओं की दिशा निर्धारित कर दी। इस समय इनकी अवस्था 16-17 वर्ष की थी। सौभाग्य से इब्न सिना को बुखारा के सुलतान नूह बिन मंसूर की दवा करने का अवसर मिला जिससे वह अच्छा हो गया। इसके फलस्वरूप इनकी पहुँच सुलतान के पुस्तकालय तक हो गई। इनकी स्मरण तथा धारणाशक्ति बहुत तीव्र थी इसलिए इन्होंने थोड़े ही समय में उस पुस्तकालय की सहायता से अपने समय तक की कुल विद्याओं का पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लिया। इन्होंने 21 वर्ष की अवस्था से लिखना आरंभ किया। इनको लेखनशैली साधारणत: स्पष्ट तथा प्रख्यात है।

इब्न सिना ने अपने पिता की मृत्यु पर अपना जीवन बड़े असंयम के साथ व्यतीत किया जो विद्या संबंधी कार्यों, भोग विलास तथा निराशाओं से भरा था। बीच में कुछ समय तक जुर्जान, रई, हमदान तथा इस्फहान के दरबारों में सुखी जीवन भी बिताते रहे। इसी काल इन्होंने कई बड़ी पुस्तकें लिखीं जिनमें अधिकतर अरबी में तथा कुछ फारसी भाषा में थीं। इनमें विशेष रूप से वर्णनीय फिलसफा का कोश 'किताबुल्‌ शफ़ा', जो सन्‌ 1313 ई. में तेहरान से छपा था, और तिब (वैद्यक) पर लिखा ग्रंथ 'अलक़ानून फीउल्‌ तिब' है जो सन्‌ 1284 ई. में तेहरान से, सन्‌ 1593 ई. में रूम से और सन्‌ 1924 ई. में बलाक से छपा है। 'किताबुल्‌ शफ़ा' अरस्तू के विचारों पर केंद्रित है, जो नव अफ़लातूनी विचारों तथा इस्लामी धर्म के प्रभाव से संशोधित परिवर्तित हो गए थे। इसमें संगीत की भी व्याख्या है। इस ग्रंथ के 18 खंड हैं और इसे पूरा करने में 20 महीने लगे थे। इब्न सिना ने इस ग्रंथ का संक्षेप भी 'अल्‌नजात' के नाम से संकलित किया था। 'अल्‌क़ानून फीउल्‌ तिब' में यूनानी तथा अरबी वैद्यकों का अंतिम निचोड़ उपस्थित किया गया है। इब्न सिना ने अपनी बड़ी रचनाओं के संक्षेप तथा विभिन्न विषयों पर छोटी-छोटी पुस्तिकाएँ भी लिखी हैं। इनकी रचनाओं की कुल संख्या 99 बतलाई जाती है। इनका एक कसीद: बहुत प्रसिद्ध है जिसमें इन्होंने आत्मा के उच्च लोक से मानव शरीर में उतरने का वर्णन किया है। मंतिक (तर्क या न्याय) में इनकी श्रेष्ठ रचना 'किताबुल्‌ इशारात व अल्शबीहात' है। इन्होंने अपना आत्मचरित भी लिखा था जिसका संकलन इनके प्रिय शिष्य अल्जुर्जानी ने किया। इनकी वास्तविक श्रेष्ठता तथा प्रसिद्धि ऐसे विद्वान्‌ तथा दार्शनिक के रूप में हैं जिसने भविष्य में आनेवाली कई शताब्दियों के लिए विद्या तथा दर्शन की एक सीमा और प्रमाण स्थापित कर दिए थे। इसी कारण शताब्दियों तक इन्हें 'अल्‌शेख अल्‌रईस' की गौरवपूर्ण उपाधि से स्मरण किया जाता रहा और अब तक भी अनेक पूर्वी देशों में किया जाता है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. हिन्दी विश्वकोश, खण्ड 1 |प्रकाशक: नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी |संकलन: भारत डिस्कवरी पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 531 |

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