आस्तीक  

आस्तीक एक ऋषि थे, जो 'जरत्कारु मुनि' और तक्षक की बहन 'जरत्कारु' के पुत्र थे। गर्भावस्था में ही इनकी माँ कैलास चली गई थीं और शंकर ने उन्हें ज्ञानोपदेश दिया। गर्भ में ही धर्म और ज्ञान का उपदेश पाने के कारण इनका नाम 'आस्तीक' पड़ा। आस्तीक ऋषि ने ही राजा जनमेजय के सर्पयज्ञ से सर्पों की रक्षा की थी।

जनमेजय का यज्ञ

भार्गव ऋषि से सांगवेद का अध्ययन समाप्त कर आस्तीक ऋषि ने शंकर से 'मृत्युंजय मंत्र' का अनुग्रह लिया और माता के साथ आश्रम लौट आए। अपने पिता परीक्षित की मृत्यु सर्पदंश से होने के कारण राजा जनमेजय ने 'सर्पसत्र यज्ञ' करके सब सर्पों को मार डालने के लिए यज्ञ किया। अंत में तक्षक नाग की बारी आई। जब आस्तीक की माता जरत्कारु को यज्ञ की बात मालूम हुई तो उन्होंने आस्तीक को मामा तक्षक की रक्षा की आज्ञा दी। आस्तीक ने यज्ञ मंडप में पहुँचकर जनमेजय को अपनी मधुर वाणी से मोह लिया। उधर तक्षक घबराकर इंद्र की शरण में चला गया।

तक्षक की रक्षा

टीका टिप्पणी और संदर्भ

संबंधित लेख

और पढ़ें

वर्णमाला क्रमानुसार लेख खोज

                              अं                                                                                                       क्ष    त्र    ज्ञ             श्र   अः



"http://m.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=आस्तीक&oldid=255440" से लिया गया