आवर्त सारणी  

तत्वों के वर्गीकरण का एक नया प्रयास न्यूलैंड्स ने सन्‌ 1861 के लगभग किया। उसने तत्वों को परमाणुभार के क्रमों के अनुसार वर्गीकृत करना आरंभ किया। उसे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि परमाणुभार के क्रम से रखने पर तत्वों के गुणों में क्रमश: कुछ विषमताएँ बढ़ती जाती हैं, पर सात तत्वों के बाद आठवाँ तत्व ऐसा आता है जिसके गुण पहले तत्व से बहुत कुछ मिलते जुलते हैं। इसे सप्तक का सिद्धांत (लॉ ऑव ऑक्टेब्ज़) कहा गया, जैसे मानो हारमोनियम के स रे ग म प ध नि स' रे' ग' म' प' ध' नि' आदि स्वर हों, जिसमें सात स्वरों के बाद स्वर की फिर आवृत्ति होती है। न्यूलैंड्स के वर्गीकरण की तीन पंक्तियाँ निन्नांकित प्रकार की थीं:

हा लि बंल बो का ना औ 1 7 9 11 12 14 16 फ्लो सो मैग्नि ऐ सि फा गं 19 23 24 27 28 31 32 क्लो पो कै क्रो टाइ मैं लो 35.5 39 40 52 48 55 56

जैसे-जैसे सप्तक नियम और आगे चलाया गया, इसकी सफलता में संदेह होने लगा और न्यूलैंड्स के वर्गीकरण से रसायनज्ञों को संतोष नहीं हुआ। न्यूलैंड्स के समय में ही सन्‌ 1862 के लगभग डिचैकार्टो ने भी परमाणुभार के क्रम से तत्वों को सर्पकुंडली की भांति सजाने का प्रयत्न किया था। यह प्रयत्न भी यह व्यक्त करता था कि परमाणुभार के क्रम और तत्वों के गुणों के आवर्तन का संबंध है।

सन्‌ 1869 में रूसी रसायनज्ञ मेंडलीफ (द्मित्री आइनोविच मेंडेलेएफ़) ने पहली बार आवर्त नियम स्पष्ट शब्दों में घोषित किया। उसने कहा कि तत्वों के भौतिक और रासायनिक गुण उनके परमाणुभारों के आवर्तफलन हैं। आवर्त अथवा आवृत्ति शब्द का अर्थ लौटना या बार बार आना है। अंकगणित की आवर्त संख्याओं से सभी को परिचय हे, जैसे 1= .076923076923... अथवा .076923, अर्थात्‌ दशमलव बनाने में 076923 ये छह अंक बार बार आतें हैं। इसी प्रकार हम यदि परमाणुभार के क्रम से तत्वों को सजाएँ तो बार बार एक से ही गुणधर्मवाले तत्व एक से ही स्थानों पर पाए जायंगे। इसी को गणित की भाषा में हम कहते हैं कि तत्वों के गुण परमाणुभारों के आवर्तफलन हैं।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. हिन्दी विश्वकोश, खण्ड 1 |प्रकाशक: नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी |संकलन: भारत डिस्कवरी पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 451-55 |
  2. सं.ग्रं.-जे.डब्ल्यू. मेलर: ए कॉम्प्रिहेंसिव ट्रीटिज़ ऑन इनॉर्गेनिक ऐंड थ्योरेटिकल केमिस्ट्री (1922); ई. रैबिनोविटश और ई. थिलो: पीरिओडिशेस सिस्टेम (स्टुट गार्ट 1930)।

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