आर्य धर्म  

(3) आर्य धर्म और संस्कृति - आर्य धर्म प्राचीन आर्यों का धर्म और श्रेष्ठ धर्म दोनों समझे जाते हैं। प्राचीन आर्यों के धर्म में प्रथमत: प्राकृतिक देवमंडल की कल्पना है जो भारत, ईरान, यूनान, रोम, जर्मनी आदि सभी देशों में पाई जाती है। इसमें द्यौस्‌ (आकाश) और पृथ्वी के बीच में अनेक देवताओं की सृष्टि हुई है। भारतीय आर्यों का मूल धर्म ऋग्वेद में अभिव्यक्त है, ईरानियों का अवेस्ता में, यूनानियों का उलिसीज़ और ईलियद में। देवमंडल के साथ आर्य कर्मकांड का विकास हुआ जिसमें मंत्र, यज्ञ, श्राद्ध (पितरों की पूजा), अतिथिसत्कार आदि मुख्यत: सम्मिलित थे। आर्य आध्यात्मिक दर्शन (ब्रह्म, आत्मा, विश्व, मोक्ष आदि) और आर्य नीति (सामान्य, विशेष आदि) का विकास भी समानांतर हुआ। शुद्ध नैतिक आधार पर अवलंबित परंपराविरोधी अवैदिक संप्रदायों-बौद्ध, जैन आदि-ने भी अपने धर्म को आर्य धर्म अथवा सद्धर्म कहा।

सामाजिक अर्थ में 'आर्य' का प्रयोग पहले संपूर्ण मानव के अर्थ में होता था। कभी-कभी इसका प्रयोग सामान्य जनता विश के लिए ('अर्य' शब्द से) होता था। फिर अभिजात और श्रमिक वर्ग में अंतर दिखाने के लिए आर्य वर्ण और शूद्र वर्ण का प्रयोग होने लगा। फिर आर्यों ने अपनी सामाजिक व्यवस्था का आधार वर्ण को बनाया और समाज चार वर्णों में वृत्ति और श्रम के आधार पर विभक्त हुआ। ऋक्संहिता में चारों वर्णों की उत्पत्ति और कार्य का उल्लेख इस प्रकार है:

ब्रह्मणोऽस्य मुखमासीद् बाहू राजन्य: कृत:।
ऊरू तदस्य यद्वैश्य: पदभ्यां शूद्रोऽजायत ।।[1]

(इस विराट् पुरुष के मुंह से ब्राह्मण, बाहु से राजस्व (क्षत्रिय), ऊरु (जंघा) से वैश्य और पद (चरण) से शूद्र उत्पन्न हुआ।) आजकल की भाषा में ये वर्ग बौद्धिक, प्रशासकीय, व्यावसायिक तथा श्रमिक थे। मूल में इनमें तरलता थी। एक ही परिवार में कई वर्ण के लोग रहते और परस्पर विवाहादि संबध और भोजन, पान आदि होते थे। क्रमश: ये वर्ग परस्पर वर्जनशील होते गए। ये सामाजिक विभाजन आर्यपरिवार की प्राय: सभी शाखाओं में पाए जाते हैं, यद्यपि इनके नामों और सामाजिक स्थिति में देशगत भेद मिलते हैं।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 10।।90।22।।
  2. हिन्दी विश्वकोश, खण्ड 1 |प्रकाशक: नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी |संकलन: भारत डिस्कवरी पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 438 |
  3. सं.ग्रं.-गॉर्डन चाइल्ड: दि एरियन्स (लंदन, 1926); एच.एच. बेंडर: द होम आव दि इंडो-यूरोपियन्यस (ऑक्सफोर्ड, 1922); बेन्स: एथनोग्राफी (स्ट्रैसबर्ग, 1912); एफ. बोआज़: जेनरल ऐं्थ्राोपालोजी (न्यूयार्क, 1939); इ. सेपिर: लैंग्वेज, रेस ऐंड कल्चर (न्यूयार्क, 1931); सुनीतिकुमार चटर्जी: भारतीय आर्यभाषा और हिंदी (राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 1954); अ.च. दास: ऋग्वैदिक इंडिया, कैंब्रे ऐंड को. (कलकत्ता, 1925); संपूर्णानंद: आर्यों का आदि देश; बी.एस. गुह: ऐन आउटलाइन ऑव रेशल एथनोलॉजी ऑव इंडिया, (कलकत्ता, 1937); हिंदी विश्वकोश, भाग 1, कलकत्ता 1917; एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका, भाग 2, शिकागो-लंदन-टोरंटो।

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