आरती पूजन  

आरती किसी भी देवी-देवता के भजन, कीर्तन और पूजा के अंत में किया जाने वाला एक महत्त्वपूर्ण कर्म है। पौराणिक ग्रंथों और हिन्दू मान्यताओं के अनुसार इसे पूजा-पाठ आदि का अहम अंग बताया गया है। आरती के दौरान कई सामग्रियों का प्रयोग किया जाता है। इन सब का विशेष अर्थ होता है। ऐसी मान्यता है कि न केवल आरती करने, बल्कि इसमें शामिल होने पर भी बहुत पुण्य मिलता है।

भजन कीर्तन

भजन कीर्तन संगीतमय पूजन या सामूहिक भक्ति का स्वरूप है, जो बंगाल के वैष्णव संप्रदाय में प्रचलित है। आमतौर पर कीर्तन में एकल गायक द्वारा एक छंद गाया जाता है, जिसे उसके बाद संपूर्ण समूह तालवाद्यों के साथ दोहराता है। कई बार गीत के स्थान पर धार्मिक कविताओं का पाठ, भगवान के नाम की पुनरावृत्ति या नृत्य भी होता है।

अर्थ

आरती पूजन के अन्त में इष्टदेवता की प्रसन्नता हेतु की जाती है। इसमें इष्टदेव को दीपक दिखाने के साथ उनका स्तवन तथा गुणगान किया जाता है। यह एक देवता के गुणों की प्रशंसा गीत है। आरती आम तौर पर एक पूजा या भजन सत्र के अंत में किया जाता है। यह पूजा समारोह के एक भाग के रूप में गाया जाता है। लगभग सभी हिन्दू समारोह और अवसरों पर आरती पूजन किया जाता है। हिन्दू धर्म में आरती गाने की एक लंबी परंपरा है और विभिन्न हिन्दू देवताओं के लिए अलग-अलग आरतियाँ हैं।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. आरती राग में ही क्यों गाई जाती हैं? (हिन्दी) (एच.टी.एम.एल) दैनिक भास्कर। अभिगमन तिथि: 16 फ़रवरी, 2011
  2. 2.0 2.1 2.2 2.3 चरणामृत सेवन का महत्त्व क्यों? (हिन्दी) (एच.टी.एम.एल) दैनिक भास्कर। अभिगमन तिथि: 16 फ़रवरी, 2011

संबंधित लेख

और पढ़ें
"http://m.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=आरती_पूजन&oldid=612607" से लिया गया