आयुर्विज्ञान में भौतिकी  

आयुर्विज्ञान में भौतिकी प्रयोगों से पता चलता है कि भौतिकी (फ़िज़िक्स) के नियमों का पालन मानव शरीर में भी होत है। उदाहरणत: मनुष्यों को विशेष उष्मामापी में रखकर जब यह नापा गया कि शरीर में कितनी गर्मी उत्पन्न होती है और हिसाब लगाया गया कि आहार का जितना अंश पचता है उतने को जलाने से कितनी गरमी उत्पन्न हो सकती थी और जब इसपर भी ध्यान रखा गया कि पसीना सूखने में कितनी ठंडक उत्पन्न हुई होगी, तब स्पष्ट पता चला कि शरीर की सारी ऊर्जा (गर्मी और काम करने की शक्ति) आमाशय और आंत्र में आहार के पाचन तथा उपचयन (ऑक्सिटाइज़ेशन) से उत्पन्न होती है; शरीर में ऊर्जा का कोई गुप्त भांडार नहीं है।

विविध पदार्थों के घोलों का गुण उनमें वर्तमान हाइड्रोजन आयनों की सांद्रता पर निर्भर रहता है। अम्लता और क्षारता भी इन्हीं आयनों पर निर्भर है। यदि रुधिर में इन आयनों की सांद्रता बहुत घट बढ़ जाय तो शारीरिक क्रियाओं में बहुत अंतर पड़ जाएगा। परंतु प्रयोगों से पता चलता है कि रुधिर में वर्तमान कारबोनेटों और फास्फेटों के कारण अम्ल अथवा क्षार अधिक आ जाने पर भी रुधिर में हाइड्रोजन आयनों की सांद्रता नहीं बदलती और इसलिए शरीर की क्रियाएँ अति विभिन्न दशाओं में भी ठीक होती रहती है।

मनुष्य का शरीर विविध प्रकार की नन्हीं-नन्हीं कोशिकाओं (सेलों) से बना है। प्रयोगों से पता चलता है कि इन कोशिकाओं के आवरण को नमक, ग्लूकोज़ आदि नहीं पार कर सकते। यदि ऐसा न होता तो उनके बाहर के द्रव में नमक, ग्लूकोज़ आदि की कमी बेशी होने पर कोशिकाएँ भी फूलती पिचकती रहतीं।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. हिन्दी विश्वकोश, खण्ड 1 |प्रकाशक: नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी |संकलन: भारत डिस्कवरी पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 411-13 |
  2. डॉ. मुकुंदस्वरूप वर्मा
  3. नामवर सिंह

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