आयुर्विज्ञान का इतिहास  

आयुर्विज्ञान का इतिहास सूत्रबद्ध विचारव्यंजन के हेतु आयुर्विज्ञान (मेडिसिन) के क्रमिक विकास को लक्ष्य में रखते हुए इसके इतिहास के तीन भाग किए जा सकते हैं:

(1) आदिम आयुर्विज्ञान

(2) प्राचीन आयुर्विज्ञान

(3) अर्वाचीन आयुर्विज्ञान

आदिम आयुर्विज्ञान-मानव की सृष्टि हुई। आहार, विहार तथा स्वाभाविक एवं सामाजिक परिस्थितियों के कारण मानव जाति पीड़ित होने लगी। उस पीड़ा की निवृत्ति के लिए उपायों के अन्वेषणों से ही आयुर्विज्ञान का प्रादुर्भाव हुआ।

पीड़ा होने के कारणों के संबंध में लोगों की निम्नलिखित धारणाएँ थीं:

(1) शत्रु द्वारा मूठ (जादू, टोना) का प्रयोग या भूत पिशाचादि का शरीर में प्रवेश।

(2) अकस्मात्‌ विषाक्त पदार्थ खा जाना अथवा शत्रु द्वारा जान बूझकर मारक विष का प्रयोग।

(3) स्पर्श द्वारा किसी पीड़ित से पीड़ा का संक्रमण।

(4) इंद्रियविशेष का तत्सदृश अथवा तन्नामधारी वस्तु के प्रति आकर्षण या सहानुभूति।

(5) किन्हीं क्रियाओं, पदार्थों अथवा मनुष्यों में विद्यमान रोगोत्पादक शक्ति।

इन्हीं सामान्य विचारों को भिन्न-भिन्न व्यक्तियों ने भिन्न-भिन्न प्रकार से अनेक देशों में दर्शाया।

उस समय चिकित्सा त्राटक (योग की एक मुद्रा), प्रयोग अथवा अनुभव के आधार पर होती थी, जिसके अंतर्गत शीतल एवं उष्ण पदार्थों का सेवन, रक्तनि:सारण, स्नान, आचूषण तथा स्नेहमर्दन आदि आते थे। पाषाणयुग से ही वेधनक्रिया सदृश विस्मयकारी शल्यक्रियाएँ प्रचलित थीं। निर्मित भेषजों में वमनकारी और विरेचनकारी योगों तथा भूत पिशाचादि के निस्सारण के लिए तीव्र यातनादायक द्रव्यों का उपयोग होता था। इस प्रकार आदिम आयुर्विज्ञान तत्कालीन संस्कृति पर आधारित था, किंतु विभिन्न देशों में संस्कृतियाँ स्वयं विभिन थीं।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 384-322 ई.पू.
  2. समय लगभग 300 वर्ष ई.पू.
  3. 1514-1564 ई.
  4. सन्‌ 1578-1657
  5. सन्‌ 1733-1804
  6. सन्‌ 1623-87
  7. सन्‌ 1716-94
  8. सन्‌ 1821-1902
  9. सन्‌ 1854-1917
  10. हिन्दी विश्वकोश, खण्ड 1 |प्रकाशक: नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी |संकलन: भारत डिस्कवरी पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 408-11 |
  11. सं.ग्रं.-अथर्ववेदसंहिता, स्वाध्यामंडल, आैंध (1943); चरकसंहिता, गुलाब कुंवर बा आयुर्वेदिक सोसायटी, जामनगर (1949); सुश्रुतसंहिता, मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी; गिरींद्रनाथ मुखोपाध्याय: हिस्ट्री ऑव इंडियन मेडिसिन, कलकत्ता विश्वविद्यालय (1923); ई.बी क्रुमभार: ए हिस्ट्री ऑव मेडिसिन (1947); महेंद्रनाथ शास्त्री: आयुर्वेद का संक्षिप्त इतिहास, हिंदी ज्ञानमंदिर लिमिटेड, बंबई, 1948; सी. सिंगर: शॉर्ट हिस्ट्री ऑव मेडिसिन (1944)।
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