अंगिरस  

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छांदोग्य उपनिषद में वर्णित कृष्ण के गुरु घोर अंगिरस इससे भिन्न हैं। पाठक भ्रमित न हों

अंगिरस अथवा अंगिरा नाम के ऋषि का उल्लेख वेदों से लेकर अनेक पुराणों में मिलने से अनुमान लगाया जाता है कि यह एक नहीं, अनेक व्यक्तियों का नाम है। इन्हें ऋग्वेद के अनेक मंत्रों का द्रष्टा बताया जाता है। अथर्ववेद के पाँच कल्पों में से अंगिरस कल्प के दृष्टा भी यही हैं। इसलिए इनका एक नाम अथर्वा भी है। एक उल्लेख के अनुसार अग्नि को भी सर्वप्रथम अंगिरा ने ही उत्पन्न किया था। वाणी और छंद के प्रथम ज्ञाता भी यही बताए गए हैं। यह भी उल्लेख मिलता है कि, पहले ये मनुष्य योनि में थे, जो बाद में देवता बन गए।

Seealso.gifअंगिरस का उल्लेख इन लेखों में भी है: अथर्ववेद, वैष्णव सम्प्रदाय, गीता कर्म जिज्ञासा, चार्वाक दर्शन, बृहदारण्यकोपनिषद, भृगु, छान्दोग्य उपनिषद, ऋभुगण एवं राष्ट्रकूट वंश

उत्पत्ति

अंगिरस शब्द का निर्माण उसी धातु से हुआ है, जिससे अग्नि का और एक मत से इनकी उत्पत्ति भी आग्नेयी (अग्नि की कन्या) के गर्भ से मानी जाती है। मतांतर से इनकी उत्पत्ति ब्रह्मा के मुख से मानी जाती है। श्रद्धा, शिवा, सुरूपा मारीची एवं दक्ष की स्मृति, स्वधा तथा सती नामक कन्याएँ इसकी पत्नियाँ मानी जाती हैं, परंतु ब्रह्मांड एवं वायु पुराणों में सुरूपा मारीची, स्वराट् कार्दमी और पथ्या मानवी को अथर्वन की पत्नियाँ कहा गया है। अथर्ववेद के प्रारंभकर्ता होने के कारण इनकी अथर्वा भी कहते हैं।

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