अलखनन्दन  

अलखनन्दन
अलखनन्दन
पूरा नाम अलखनन्दन
जन्म 1948
जन्म भूमि भोजपुर, बिहार
मृत्यु फ़रवरी, 2012
मृत्यु स्थान भोपाल, मध्य प्रदेश
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र रंगकर्मी, निर्देशक और कवि
पुरस्कार-उपाधि संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, शिखर सम्मान
प्रसिद्धि रंगकर्मी
विशेष योगदान अलखनन्दन जी ने स्माइल मर्चेन्ट व अन्य निर्देशकों के साथ फ़िल्म क्षेत्र में भी योगदान दिया था।
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी आप भोपाल में होने वाले लगभग हर नाटक को देखते थे। 'भारत भवन' में उनके लिये एक कुर्सी सदैव ख़ाली रखी जाती थी।

अलखनन्दन (जन्म- 1948, भोजपुर, बिहार; मृत्यु- फ़रवरी, 2012, भोपाल, मध्य प्रदेश) भारत के प्रसिद्ध रंगकर्मी, निर्देशक और कवि थे। लभगग 40 वर्ष के अपने रंग जीवन में उन्होंने कई प्रसिद्ध नाटकों का निर्देशन किया था। वे लम्बे समय तक 'भारत भवन' के रंगमंडल के सहायक निदेशक भी रहे। अलखनन्दन ने स्माइल मर्चेन्ट व अन्य निर्देशकों के साथ फ़िल्म के क्षेत्र में भी अपना योगदान दिया था। उनके प्रसिद्ध नाटकों में 'चंदा', 'बैढनी', 'महानिर्वाण', 'वेटिंग फ़ॉर गोडो' आदि शामिल हैं। वर्ष 2012 में उन्होंने महाकवि रवींद्रनाथ टैगोर की कविताओं का मंचन भी किया था, जिसे देश भर में अत्यंत सराहा गया।

जीवन परिचय

अलखनन्दन जी का जन्म सन 1948 में भोजपुर, बिहार में हुआ था। बिहार से विस्थापित होकर वे छत्तीसगढ़, सरगुजा और बुंदेलखण्ड के इलाकों में बार-बार जाते रहे थे। इन इलाकों से उनका गहरा लगाव और प्रेम था। उनकी समूची बुनावट में जो मिश्रण था, वह इसी घुमन्तू आचरण का परिणाम था। वे भोजपुरी बोलना कभी नहीं भूले, जबकि उनका अंतिम परिदृश्य बुंदेलखण्ड ही बना। जबलपुर आकर वे स्थिर हुए और प्राण प्रण से काम करना शुरू किया। उनकी काया में जो भाषा तैर रही थी, वह संघर्षशील हिन्दी पट्टियों में ही तैयार हुई थी। अलखनन्दन कुंभकार के चाक की तरह अविराम अपने जीवन को चलाते रहे। उन्होंने नाटक किये भी और कई नाटकों की रचना भी की।

नाटक निर्देशन

अलखनन्दन की जबलपुरिया शुरुआत एक नुक्कड़ नाटक 'जैसे हम लोग' से हुई। इसे हिन्दी के कथाकार शशांक ने लिखा था। शशांक तब मनोविज्ञान के छात्र थे। एक स्थानीय रंग-संस्था 'कचनार' के लिये अलखनन्दन ने मशहूर नाटकों- 'रंग गंधर्व' और 'तीन अपाहिज' का निर्देशन किया। विवेचना के साथ उन्होंने 'दुलारी बाई', 'बकरी', 'इकतारे की आँख', 'बहुत बड़ा सवाल', और 'वेटिंग फ़ॉर द गोडो' जैसे बड़े नाटक किये और इन नाटकों ने खूब धूम मचाई। इसी दौरान अलखनन्दन ने धमतरी, रायपुर, बिलासपुर और बाद में अम्बिकापुर, रायगढ में ऐसी कार्यशालाएँ कीं, जिनसे स्थानीय रंगकर्मी उभर कर आ सकें।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

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