अबूबक्र खलीफा  

पदारोहण के एक वर्ष के भीतर ही अबू बक्र ने खालिद (पुत्र वलीद) को, जो संसार के सर्वोत्तम सेनापतियों में से था, आज्ञा दी कि वह मुसन्ना नामक सेनापति के साथ 18,000 सैनिक लेकर इराक पर चढ़ाई करे। इस सेना ने ईरानी शक्ति को अनेक लड़ाइयों में नष्ट करके बाबुल तक, जो ईरानी साम्राज्य की राजधानी मदाइन के निकट था, अपना आधिपत्य स्थापित किया। इसके बाद खालिद ने अबू बक्र के आज्ञानुसार इराक से सीरिया की ओर कूच किया और वहाँ मरुस्थल को पार करके वह 30,000 अरब सैनिकों से जा मिला और 1,00,000 बिजंतीनी सेना को फिलस्तीन के अजन दैइन नामक स्थान पर परास्त किया (31 जुलाई, 634 ई.)। कुछ ही दिनों बाद अबू बक्र का देहांत हो गया (23 अगस्त, 624)।

शासनव्यवस्था में अबू बक्र ने पैगंबर द्वारा प्रतिपादित गरीबी और आसानी के सिद्धांतो का अनुकरण किया। उनका कोई सचिवालय और नाजकीय कोष नहीं था। कर प्राप्त होते ही व्यय कर दिया जाता था। वह 5,000 दिरहम सालाना स्वयं लिया करते थे, किंतु अपनी मृत्यु से पूर्व उन्होंने इस धन को भी अपनी निजी संपत्ति बेचकर वापस कर दिया।[2]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. हिन्दी विश्वकोश, खण्ड 1 |प्रकाशक: नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी |संकलन: भारत डिस्कवरी पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 168 |
  2. सं.ग्रं._ म्योर: कैलिफेट; उर्दू तबरी के इतिहासों का अनुवाद, जैसे इब्ने अहसीर (हैदराबाद में मुद्रित) तथा इब्ने खलदून।

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