अबाध इच्छा  

अबाध इच्छा दर्शन, नीति, समाजशास्त्र और मनोविज्ञान का एक जटिल विवादग्रस्त विषय। प्रत्येक क्षेत्र में प्रश्न यही होता है कि मनुष्य जाए चाहे करने या न करने को स्वाधीन है कि नहीं। प्राय: इसे इच्छा स्वातंत्रय की समस्या कहा जाता है। परंतु मनुष्य जिस इच्छा को चाहे उसी को मन में नहीं उत्पन्न कर सकता। वह उठी हुई इच्छाओं में से जिसको चाहे कार्यान्वित करने को स्वतंत्र है कि नहीं, यही प्रश्न है। इसलिए इसे संकल्पस्वातंत्रय की समस्या कहना अधिक यथार्थ होगा। पश्चिम से प्राचीन दर्शन में मानसिक--शक्ति--तत्वों की जारणा के प्रचार के कारण वहाँ के स्पिनोज़ा जैसे बुद्धिवादी और लॉक जैसे अनुभववादी दोनों प्रकार के विचारको ने संकल्प के कोई वास्तविक मानसिक--शक्ति--सत्ता न होने के पक्ष में बहुत तर्क किए हैं। यह ठीक ही है कि कोई संकल्प-शक्ति-तत्व नहीं। व्यक्ति अथवा व्यक्त्वि ही संकल्प किया करता है, और उसके ही स्वातंत्रय का प्रश्न है। परंतु इसे व्यक्तिस्वातंत्रय अथवा मनुष्यस्वातंत्रय का प्रश्न कहने से व्यक्ति एवं राज्य अथवा समाज के परस्पर अधिकारों के इससे भिन्न प्रश्नों को इस प्रश्न से अलग रखना कठिन हो जाने की आशंका है।

इस प्रश्न का प्रथम निश्चित उत्तर प्राचीन भारत में प्रतिपादित कर्मवाद के सिद्धांत में मिलता है। कर्मविपाक की दृष्टि से मनुष्य कर्म के अभेद्य बंधनों से जकड़ा हुआ है और उसे किसी प्रकार का प्रवृत्तिस्वातंत्रय भी प्राप्त नहीं है। संदर्भ में, धम द्वारा इन बंधनों से मोक्षप्राप्ति के आश्वासन को और संकल्प के स्वातंत्रय अनुभवको सार्थक करने के लिए, वेदांत एवं सांख्य ने संचित कर्म के अंतर्गत प्रारबध तथा अनारब्ध कम्र में भेद किया है। प्रारब्ध वे संचित कर्म हैं जिनके फल का भोगना आरंभ हो गया है; उनको तो भोगना अभी आरंभ नहीं हुआ है। इनका ज्ञान से पूर्णतया नाश किया जाए सकता है। मीमांसा दर्शन ने नित्य और नैमितिक कर्मो को शास्त्रोक्त विधि से करते रहने तथा काम्य एवं निषिद्ध कर्मो को त्याग देने से कर्मबंधन से मुक्ति अर्थात्‌ नैष्कमर्यप्राप्ति को संभव बताया है। गीता, महाभारत और उपनिषदों में किसी प्रकार के कर्म को सर्वथा छोड़ देना असंभव माना गया है। इसलिए ब्रह्मात्मैक्य ज्ञान द्वारा मोक्ष का उपदेश दिया गया है और इस ज्ञान की प्राप्ति के लिए पातंजलयोग, अध्यात्म-विचार, भक्ति और कर्मफलासक्तित्याग अर्थात्‌ निष्काम कर्मयोग आदि मार्ग बताए गए हैं। परंतु यदि प्राणिमात्र अपनी कर्मनिर्धारित प्रकृति के अनुसार ही चलें तो मनुष्य ज्ञान प्राप्त करने के लिए स्वतंत्र कैसे होगा? भारतीय अध्यात्मशास्त्र का उत्तर यह है कि मनुष्य में देह भी है और आत्मा भी। आत्मा मूल में ब्रह्म से अभिन्न है। नामरूपात्मक कर्म अनित्य और परब्रह्म की ही लीला होने से उसी को पूर्णतया आच्छादित कर बाध्य करने में असमर्थ है। फिर,जाए आत्मा कर्मव्यापारों का एकीकरण करके सृष्टि ज्ञान उत्पन्न करता है उसे स्वयं उस सृष्टि से भिझ एवं स्वतंत्र होना ही चाहिए। यह स्वातंत्रय व्यवहार में तब प्रगट होता है जब परमात्मा का ही अंशभूत जीव पूर्वकर्मार्जित प्रकृति के बंधनों में बँध जाता है और इस बद्धावस्था से उसको मुक्त करने के लिए मोक्षानुकूल कर्म करने की प्रवृत्ति इंद्रियों में होने लगती है। परंतु यह स्वातंत्रय वास्तव में आत्मा के इच्छारहित अकर्तापद को प्राप्त करने की प्रेरणा का है, साधारण इच्छा, बुद्धि, मन अथवा व्यक्तित्व का नहीं। वही स्वतंत्र रीति से व्यक्तित्व, मन, बुद्धि अथवा इच्छा को प्रेरणा दिया करता है। जीव--ब्रह्म--अद्वैत को न माननेवाले, भक्तिहेतु द्वैत में विश्वास करनेवाले विचारकों ने भी जीव के स्वातंत्रय को उसका अपना व्यक्तिगत नहीं वरन, स्वप्रयास करनेवालों को परमेश्वर की देवी कृपा से प्राप्य माना है। बौद्धों को प्राय: आत्मा अथवा ईश्वर में विश्वास नहीं होता, परंतु उन्होने भी स्वप्रयास, स्वातंत्रय, सामर्थ्य एवं उत्तरदायित्व का उपदेश दिया है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. सं.ग्रं.--ऋग्वेद; उपनिषद् ग्रंथ; श्रीमद्ववद्गीता; योगवासिष्ठ; पातंजल योगसूत्र; सांख्यकारिका; जैमिनी मीमांसासूत्र; वेदांतसूत्र; शांकर भाष्य; महाभारत; धम्मपद; महापरिनिब्बान सुत्तंत; प्लैटो: रिपब्लिक; अरस्तू : एथिक्स; ज़ेलर : स्टोइकस्‌, एपीक्योरियंस ऐंड सोप्टिक्स; सैकयोन; सेलेक्शंस फ्राम मेडीवल फिलॉसफर्स, उसेकार्त्तस : मेडिटेशंस; लॉक : क्रिटिक ऑव प्रैक्टिकल रीज़न; ग्रीन : प्रोलेग्मेना टु एथिक्स; बर्गसाँ : टाइम ऐंड फ्री विल; यूकेन : प्रज़ेंट डे एथिक्स इन देयर रिलेशंस टु दि स्पिरिचुअल लाइफ; बन : दि इमोशंस ऐंड दि विल; टर्नर : विश ऐंड विल; क्रोचे : फिलासफी ऑव दी प्रैक्टिकल; सोली : फ्रीविल ऐंड डिटरमिनिज्म; पिलर : दि बेसिस ऑव फ्रीडम; पेरन : दि गुडविल; लॉस्की : फ्रीडम ऑव दि विल; बर्दमेव : फ्रीडम ऐंडम दि स्पिरिट।
    1. हिन्दी विश्वकोश, खण्ड 1 |प्रकाशक: नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी |संकलन: भारत डिस्कवरी पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 163-64 |
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