अध्यक्ष  

अध्यक्ष आधुनिक रूप में अध्यक्ष (स्पीकर) के पद का प्रादुर्भाव मध्य युग (13वीं और 14वीं शताब्दी) में इंग्लैंड में हुआ था। उन दिनों अध्यक्ष राजा के अधीन हुआ करते थे। सम्राट् के मुकाबले में अपने पद की स्वतंत्र सत्ता का प्रयोग तो उन्होंने धीरे-धीरे 17वीं शताब्दी के बाद ही आरंभ किया और तब से ब्रिटिश लोकसभा (हाउस ऑव कामन्स) के मुख्य प्रतिनिधि और प्रवक्ता के रूप में इस पद की प्रतिष्ठा और गरिमा बढ़ने लगी। इस ब्रिटिश संसद में अध्यक्ष के मुख्य कृत्य (क) सभा की बैठकों का सभापतित्व करना,
(ख) सम्राट् और लार्ड सभा (हाउस ऑव लार्ड्‌स) इत्यादि के प्रति इसके प्रवक्ता और प्रतिनिधि का काम करना और
(ग) इसके अधिकारों और विशेषाधिकारों की रक्षा करना है।

अन्य देशों ने भी ग्रेट-ब्रिटेन के नमूने पर संसदीय प्रणाली अपनाई और उन सबमें थोड़ा ब्रिटिश अध्यक्ष के ढंग पर ही अध्यक्ष पद कायम किया गया।

भारत में अध्यक्ष पद

भारत ने भी स्वतंत्र होने पर संसदीय शासनपद्धति अपनाई और अपने संविधान में अध्यक्षपद की व्यवस्था की। किंतु भारत में अध्यक्ष का पद वस्तुत: बहुत पुराना है और यह 1921 से चला आ रहा है। उस समय अधिष्ठाता (प्रिसाइडिंग आफिसर) विधानसभा का 'प्रधान' (प्रेसिडेंट) कहलाता था। 1919 के संविधान के अंतर्गत पुरानी केंन्द्रीय विधानसभा का सबसे पहला प्रधान सर फ्रेडरिक ह्वाइट को, संसदीय प्रक्रिया और पद्धति में उनके विशेष ज्ञान के कारण, मनोनीत किया गया था, किंतु उसके बाद श्री विट्ठलभाई पटेल और उनके बाद के सब 'प्रधान' सभा द्वारा निर्वाचित किए गए थे। इन अधिष्ठाताओं ने भारत में संसदीय प्रक्रिया और कार्यसंचालन की नींव डाली, जो अनुभव के अनुसार बढ़ती गई और जिसे वर्तमान संसद ने अपनाया।

टीका टिप्पणी और संदर्भ


अध्यक्ष (हिंदी) भारतखोज। अभिगमन तिथि: 26 नवंबर, 2013।

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