अंडा  

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अंडा उस गोलाभ वस्तु को कहते हैं जिसमें से पक्षी, जलचर और सरीसृप आदि अनेक जीवों के बच्चे फूटकर निकलते हैं। पक्षियों के अंडों में, मादा के शरीर से निकलने के तुरंत बाद, भीतर केंद्र पर एक पीला और बहुत गाढ़ा पदार्थ होता है जो गोलाकार होता है। इसे योक कहते हैं। योक पर एक वृत्ताकार, चिपटा, छोटा, बटन सरीखा भाग होता है जो विकसित होकर बच्चा बन जाता है। इन दोनों के ऊपर सफेद अर्ध तरल भाग होता है जो ऐल्ब्युमेन कहलाता है। यह भी विकसित हो रहे जीव के लिए आहार है। सबके ऊपर एक कड़ा खोल होता है जिसका अधिकांश भाग खड़िया मिट्टी का होता है। यह खोल रध्रंमय होता है जिससे भीतर विकसित होने वाले जीव को वायु से आक्सीजन मिलता रहता है। बाहरी खोल सफेद, चित्तीदार या रंगीन होता है जिससे अंडा दूर से स्पष्ट नहीं दिखाई पड़ता और अंडा खाने वाले जंतुओं से उसकी बहुत कुछ रक्षा हो जाती है।

संरचना

आरंभ में अंडा एक प्रकार की कोशिका (सेल) होता है और अन्य कोशिकाओं की तरह यह भी कोशिका द्रव्य (साइट्रोप्लाज्म) और केंद्रक (न्यूक्लियस) का बना होता है, परंतु उसमें एक विशेषता होती है जो और किसी प्रकार की कोशिका में नहीं होती और वह है प्रजनन की शक्ति। संसेचन के पश्चात्‌ जिसमें मादा के डिंब और नर के शुक्राणु कोशिका का समेकन होता है, और कुछ जंतुओं में बिना संसेचन के ही, डिंब विभाजित होता है, बढ़ता है और अंत में जिस जंतु विशेष का वह अंडा रहता है उसी के रूप, गुण और आकार का एक नया प्राणी बन जाता है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. अंडा (हिंदी) भारतखोज। अभिगमन तिथि: 18 फ़रवरी, 2014।

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